आलेख(9 जून पुण्यतिथि पर विशेष)
लोक संगीत को नया आयाम देने वाले खुमान लाल साव
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बहुमुखी
प्रतिभा के धनी
आपने
शिक्षक के रूप में अपने जीवन की शुरूआत की तथा इसी दौरान ही संगीत के क्षेत्र में
कदम रखा।आपने संगीत में विधिवत शिक्षा ली है। आपने संगीत के क्षेत्र में शुरूआत
राजनांदगांव के एक ख्याति प्राप्त आर्केस्ट्रा पार्टी से की थी। उस जमाने में इस
आर्केस्ट्रा टीम की एक अलग पहचान थी तथा आर्केस्ट्रा लोगों के लिए महत्वपूर्ण
मनोरंजन के साधनों में होता था। इसके बाद आप दाऊ मंदराजी साव के साथ नाचा पार्टी
में संगीतकार के रूप में काफी दिनों तक जुड़े रहे। इसके बाद अंत में चंदैनी गोंदा
लोक मंच के लिए अपने को समर्पित कर दिए। आपने कई आंचलिक फिल्मों के लिए संगीत भी दिए। कलाकारों को पहचान कर उनका सम्मान भी आप करते रहे। इसी का परिणाम रहा कि दाऊ मंदराजी साव के दिवंगत होने
के बाद उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए
दाऊजी के गृह ग्राम रवेली में हर वर्ष 1
अप्रेल को नाचा महोत्सव अब तक करते आ रहे थे। इस महोत्सव के माध्यम से नाचा
कलाकारों को मंच और सम्मान भी मिलता रहा है। इसके साथ ही दाऊ मंदराजी के
व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाशित पुस्तिका का संपादन भी आपने किया था।चाहे वह नाचा का क्षेत्र हो, आर्केस्ष्ट्रा का क्षेत्र हो या लोक
नाट्य का क्षेत्र हो, सभी में खुमानलाल साव जी ने अपनी प्रतिभा
से बेहतर प्रस्तुति देने में कोई कमी नहीं की।
अनुशासित
टीम
खुमानलाल
साव अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुशासित रहते थे और अपने अधीनस्थ लोगों को भी
अनुशासन में रखते थे। समर्पण, त्याग, धैर्य, कर्तव्यनिष्ठता, आत्म
स्वाभिमानी, ईमानदारी और जिम्मेदारी का उचित
निर्वहन आपकी विशेषताओं में रही है। यही कारण रहा कि सावजी के सामने या इर्द-गिर्द
रहने वाले काफी सोच-विचार कर अपनी बातों को रखते थे। अनुचित या गलत लगने पर सावजी
अपनी असहमति तत्काल व्यक्त करते थे जिसके कारण कई लोगों को असहज सा भी लगता और साव जी के पास फटकने से कतराते रहते थे। जितने लोगों ने
सावजी को समझा वे आज जुझारू होकर कर्तव्यनिष्ठ होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर
रहे हैं। फूहड़ता, अश्लीलता से कोसो दूर कला के माध्यम से
माटी की सेवा की सीख कलाकारों को आप हमेशा देते रहे। आपके अनुशासित टीमों में भैया लाल हेडऊ, लक्ष्मण मस्तुरिहा, जयंती यादव, केदार यादव, प्रीतम धर्माकर,बासंती देवार, कविता वासनिक, मुकुंद कौशल, रामेश्वर वैष्णव, पंचराम देवदास, कृष्ण कुमार चौबे जैसे अनेक कलाकारों
और साहित्यकारों के नामों की श्रृंखला है जिन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी की खूशबू को
इस लोकनाट्य के माध्यम से बिखरने में कोई कमी नहीं की।
छत्तीसगढ़ी
लोक कला के क्षेत्र में नाचा के माध्यम से अंचल के लोग सदियों से मनोरंजन करते रहे
हैं। कई दशकों तक खड़े साज नाचा का चलन अंचल में रहा है। इस दौरान यह लोगों के
मनोरंजन का मुख्य साधन होता था। इसके बाद लोक कला के क्षेत्र में क्रांतिकारी
परिवर्तन का दौर हुआ और नाचा के बाद एक प्रयोग के रूप में लोक मंचीय प्रस्तुति की
नींव दाऊ रामचंद्र देशमुख ने रखी। दाऊ रामचंद्र देशमुख ने अंचल के कलाकारों को एक
मंच में लाकर लोक मंचीय टीम तैयार करने में काफी मशक्कत की। यह आपकी विशेषता रही
कि आप स्वयं एक कला साधक होने के साथ ही कला और कलाकार के पारखी भी थे इस कारण प्रतिभा संपन्न कलाकार और इससे संबंधित विधाओं के लोगों
को पहचान कर अपनी टीम में शामिल कर लोक नाट्य मंच ‘चंदैनी गोंदा’
तैयार किए। आपने इसी टीम के लिए
जिम्मेदार संगीतकार के रूप में खुमान लाल साव का चयन किए। इसके बाद आप दोनों ने
मिलकर लोक मंच ‘चंदैनी गोंदा’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य को
नई दिशा दी। इस चंदैनी गोंदा मंच में दाऊ रामचंद्र देशमुख के अपेक्षानुरूप आप
संगीत गढ़ते रहे। दाऊ रामचंद्र देशमुख ने इस चंदैनी गोंदा के सफलतापूर्वक 101 मंचन के बाद विसर्जित कर दिए।
खुमानलाल साव केवल राजनांदगांव जिले में ही नहीं संपूर्ण छत्तीसगढ़ के साथ देश के
कोने-कोने में चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति से एक ख्याति लब्ध संगीतकार में रूप में
जाने गए। ‘चंदैनी गोंदा’
के इस मंच को खुमानलाल साव ने अपने
अंतिम सांसों तक संगीत से सजाया, वे
कालजई हो गए।
लोगों की जुबान पर गीत
खुमान
साव के पास जितने भी गीतों के लिए रचनाएं आती, उसे संगीत के माध्यम से सुमधुर और
लोकप्रिय बनाने में कोई समझौता नहीं करते थे। एक गीत को तैयार करने में कभी कभी महीनों भी आपको लगते थे। जब तक संतुष्ट नहीं होते थे, तब तक वे गीतों की प्रस्तुति नहीं करते थे। आपके द्वारा संगीत दिए गानों में पता ले जा रे गाड़ी वाला...मोर संग चलव रे...धर ले रे कुदारी गा किसान...मैं छत्तीसगढ़िया अंव रे...धन धन रे मोरे किसान दे...जैसे अनेक गीत मंचों में वाहवाही और तालियां बटोरते रहे। आकाशवाणी के माध्यम से इन गीतों का प्रसारण होते रहते हैं। आज भी अनेक गीतों को लोगों की जुबान से गुनगुनाते देखे जा सकते हैं। आपकी विशेषता रही कि आपने जितने भी गानों को संगीत से सजाया, वे कालजई हो गए।
आपके संचालन में जब चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति होने लगी तो कलाकारों को लखोली राजनांदगांव में अभ्यास के लिए आमंत्रित करते थे। इसके बाद पिछले तीन-चार दशकों से आप अपने गृह ग्राम ठेकवा में ही कलाकारों को अभ्यास करा कर प्रस्तुति देते रहे।
सम्मान और प्रतिष्ठा के भाग-दौड़ से दूर
आपने जीवन भर कलाकारों को तराशकर उन्हें मंच प्रदान करते रहे। जितने भी आज कला विधाओं के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं उनमें अधिकांशत: सावजी के शिष्य या सानिध्य में रहे हैं। सम्मान और प्रतिष्ठा के भाग-दौड़ से दूर संगीत की नि:स्वार्थ सावजी ने की। कला साधकों को अपनी अलग से पहचान बताने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि कला के माध्यम से ही कलाकार की पहचान बनती थी। कला के कारण ही खुमान लाल साव छत्तीसगढ़ में संगीतकार के रूप में जाने-पहचाने गए। इसी कला का सम्मान करते हुए पिछले वर्ष सैंकड़ों की संख्या में कला प्रेमियों द्वारा राजनांदगांव में आपका नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस अवसर पर प्रदेश भर के कलाकार, कलाप्रेमी और बुद्धिजीवियों ने आपका सम्मान करते हुए अपने आपको गौरवान्वित महसूस किए। इसी तरह प्रतिभा का सम्मान करते हुए आपके समर्थन में अनेक कलाकार और संस्थाओं ने औपचारिकताएं पूरी कर संगीत कला अकादमी पुरस्कार के लिए अनुशंसा की थी। आपकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन हुआ और संगीत कला अकादमी पुरस्कार हेतु नई दिल्ली में सम्मानित हुए।
खुमान लाल साव जी इस सांसारिक जीवन से अलविदा कह चुके हैं। आगे चंदैनी गोदा की प्रस्तुति होगी या नहीं, यह कह पाना भी अभी मुश्किल हो रहा है। आज कला और कलाकारों के सामने अनेक चुनौतियां हैं। लोक मंचों के गाने और गाने के स्तर, नृत्य और भाव पक्ष के स्तर, संगीत पक्ष से हम सभी भली भांति परिचित हैं। लोक मंचों की प्रस्तुति और प्रदर्शन के स्तर में गिरावट आई है। परिस्थितियां आज ठीक विपरीत है। ऐसे में लोकमंचों की गुणवत्ता और प्रस्तुति में प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में कला से जुड़े लोगों को चाहिए की खुमान लाल साव जैसे व्यक्तित्व के पद चिन्हों पर चलकर हमारी कला को संजोने और सहेजने में अपना योगदान दें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।आपसे जुड़े कई कलाकार लोक मंच संचालन, फिल्म लोक नाट्य नाचा के क्षेत्र में गायन वादन नृत्य व अभिनय कला व सम्बंधित विधों में पारंगत होकर लोक कला के क्षेत्र में बेहतर प्रस्तुति दे रहे हैं। गुरू -शिष्य परंपरा का निर्वहन भी आपकी टीम में देखने को मिलता रहा है।आज की पीढ़ी को कला के क्षेत्र में काम करने वाली प्रतिभाओं को खुमान लाल के व्यकिक्ततव से प्रेरणा लेनी चाहिए।पहले दाऊ जी के साथ अभ्यास का क्रम उनके निवास बघेरा में होता था। इसके बाद आपने लखोली राजनांदगांव में अभ्यास के लिए कलाकारों को आमंत्रित किए। पिछेल तीन-चार दशकों से आप अपने गृह ग्राम में ही कलाकारों को अभ्यास कराते रहे। लोगों की जुबान पर गीत आपके पास जितने भी गीतों के लिए रचनाएं आती संगीत के माध्यम से सुमधुर और लोकप्रिय बनाने में कोई कमी नहीं करते थे। एक गीत को तैयार करने मे कभी कभी महीनों भी आपको लगते थे। जब तक संतुष्ट नहीं होते थे तब तक गीतों की प्रस्तुति नहीं करते थे। आपके द्वारा संगीत दिए गानों में पता ले जा रे गाड़ी वाला...मोर संग चलव रे...धर ले रे कुदारी गा किसान...मैं छत्तीसगढ़िया अंव रे...धन धन रे मोरे किसान दे...जैसे अनेक गीत मंचों में वाहवाही और तालियां बटोरते रहे।आकाशवाणी के माध्यम से इन गीतों का प्रसारण होते रहते हैं। आज भी अनेक गीतों को लोगों की जुबान से गुनगुनाते देखे जा सकते हैं।इनके इन जस•ाी आकाशवाणी पवे अपनी इस प्रतिभा को आगे लाने में सावजी की ही देन बताते हैं। के आपकी विशेषता रही कि आपने जितने भी गानों को संगीत से सजाया वे कालजई हो गए। सम्मान और प्रतिष्ठा के भाग-दौड़ से दूर आपने जीवन भर कलाकारों को तराशकर उन्हें मंच प्रदान करते रहे। जितने भी आज कला विधाओं के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं उनमें अधिकांशत: सावजी के शिष्य या सानिध्य में रहे हैं। सम्मान और प्रतिष्ठा के भाग-दौड़ से दूर संगीत की आपने नि:स्वार्थ सेवा की। कला और कला साधक को अपनी पहचान बताने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि कला के माध्यम से कलाकार की पहचान बनती थी। इसी कला के कारण ही खुमानलाल साव छत्तीसगढ़ में संगीतकार के रूप में जाने पहचाने गए। इसी कला का सम्मान करते हुए पिछेले वर्ष आपका नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें प्रदेश भर के कलाकार कलाप्रेमी बुद्धिजीवियों ने आपका सम्मान करते हुए अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया था। संगीत कला अकादमी द्वारा आपको सम्मानित किया गया। आपने इसके लिए व्यक्तिगत प्रयास नहीं किया बल्कि कला साधकों ने ही आपके समर्थन में सारी औपचारिकताएं पूरी की थी। खुमानलाल साव केवल राजनांदगांव जिले में ही नहीं संपूर्ण छ्ततीसगढ़ में एक ख्याति लब्ध संगीतकार में रूप में जाने गए। चंदैनी गोंदा को केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं देश के कोने कोने में प्रस्तुति होती रही है।आपने अपनी टीम में सफल संचालक का भी परिचय दिया है। आपने कलाकारों को कला के माध्यम से बांधे रखने में अभूतपूर्व क्षमता थी। अनुशासन कार्य के प्रति समर्पण , जिम्मेदारियों का निर्वहन, समय का पाबंद पर भी ध्यान देते रहे
दिनांक 12-06-2019
स्थान-रायपुर
डा. दीनदयाल साहू
साहित्यकार व संपादक
पता-प्लाट न. 429 सड़क न.-07
माडल टाऊन नेहरु नगर भिलाई मो.-97523-61865



1 टिप्पणियाँ
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में आपके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता
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